शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

बेटी होना गुनाह है ?

बेटी माँ से ,
बेटी होना गुनाह है ?
माँ ,
बस  तीन बातें याद रख .....
भगिनी ,
भोग,
भरण.
 तू इसी लिए ,
पैदा हुई है.
 बेटी ने कहा,
ये ठीक नहीं माँ ,
मुझे,
ये बंधन ही नहीं,
ख़ुद का,
फैसला भी चाहिए,
जो मुझे ,
अपने रूप से जीने दे,
माँ ,
अच्छा होता ,
ये कुल कलंकिनी,
पैदा ही ना लेती.
तू तो ,
नारी  जाति के ,
नाम पर ,
कलंक है ,
जो वर्षों से,
चली आ रही ,
इस ,
मर्यादा को ,
तोड़ने पर ,
उतारू है.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

11 टिप्‍पणियां:

  1. .

    Rajni ji ,

    आपकी टिपण्णी कहीं पढ़ी थी , इसलिए सम्बंधित विषय पर एक लिंक दे रही हूँ। समय निकाल कर एक नज़र अवश्य डालियेगा।

    http://zealzen.blogspot.com/2010/12/love-marriage.html

    Thanks.

    .

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  2. माँ बेटी का बेहतरीन संवाद बहुत अच्छा लगा।

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  3. Aad.Rajani ji,
    Aapke tewar men bahut aag hai.
    Naari ki sthiti aur vyatha ka satik chitran kiya hai aapne.
    Sadiyon se purush pradhan samaj naari ki vivashata ka fayada uthata aa raha hai.
    Ab samay aa gaya hai ki naari ko usaka adhikaa aur samman wapas diya jay.
    Aapke vichaarottejak lekhani ko naman.

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  4. mera hardik naman aap sabhi ko jo mere lekhni me chhupe vytha aur javala ko maan diya hai aasha hai aage bhi aapsbhi ka sneh pati rahungi.....aabhar aate rahiyega man ko sabalta prdan karti hai aap sabhi ki protsahan

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  5. आज लड़कियों की दुखद स्थिति के लिए औरतें ही अधिक दोषी हैं.
    आज भी वे समाज के सड़े गले रीती रिवाजों से चिपकी हुई हैं.
    चाहे उन्हें जितना भी समझायिए! एक उम्र तक तो उन्हें समझ आता है
    किन्तु जहां सास बनी वहीँ सारी प्रगतिशीलता ख़त्म
    सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना !बधाई इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिये आज भी वे समाज के सड़े गले रीती रिवाजों से चिपकी हुई हैं.
    चाहे उन्हें जितना भी समझायिए! एक उम्र तक तो उन्हें समझ आता है
    किन्तु जहां सास बनी वहीँ सारी प्रगतिशीलता ख़त्म

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